परगणवासी य पुणो अव्वावारो गणी हवदि तेसु ।
णत्थि य असमाहाणं आणाकोवम्मि वि कदम्मि॥392॥
पर-गण वासी मुनि होते हैं शिक्षादिक व्यापार विहीन ।
आज्ञाकोप न होय कदापि अतः समाधि न होती क्षीण॥392॥
अन्वयार्थ : और यदि आचार्य परसंघ में वास करते हैं तो शिक्षादि व्यापार से रहित होते हैं और किसी ने आज्ञा नहीं मानी तो अपने परिणामों में असावधानी नहीं होती है ।

  सदासुखदासजी