
खुड्डे थेरे सेहे असंवुडे दट्ठु कुणइ वा परुसं ।
ममकारेण भणेज्जो भणिज्ज वा तेहिं परुसेण॥393॥
क्षुल्लक1, वृद्ध2, अमार्गज्ञ3 की संयमहीन प्रवृत्ति देख ।
उनके प्रति ममता से गुरुवर कह देते हैं कटुकवचन॥393॥
अन्वयार्थ : गुणों से जो हीन हैं, ऐसे क्षुद्र को तथा तप से वृद्ध ऐसे स्थविर को अमार्गज्ञ अर्थात् रत्नत्रय को नहीं जाननेवाले को असंयमरूप प्रवर्तते देखकर ममकार/ममता से "ये हमारे शिष्य हैं या संघ के हैं" ये ऐसे अयोग्य कैसे प्रवर्तते हैं? ऐसा विचार करके स्वयं से कठोर वचन निकल जायें, कटुक वचनों से तिरस्कार के वचन कहने में प्रवृत्ति हो जाये अथवा संघ अज्ञानी क्षुद्रादि आपको निंद्यवचन कहें और स्वयं कठोर वचन बोलें तो समाधि बिगड जाये और सामनेवाला आपकी निंदा करे तो अपने परिणाम बिगडेंगे तो समाधिमरण बिगड जायेगा । अत: अपना संघ छोडकर परसंघ में जाना ही श्रेष्ठ है ।
सदासुखदासजी