
कलहपरिदावणादी दोसे व अमाउले करंतेसु ।
गणिणो हवेज्ज सगणे ममत्तिदोसेण असमाधी॥395॥
क्षुद्र मुनि यदि करे संघ में कलह तथा तापादिक दोष ।
उसे देखकर ममता से हो सकती सूरि-समाधि सदोष॥395॥
अन्वयार्थ : कदाचित् संघ में किसी मुनि का किंचित् कलह परितापनादि परस्पर हो जाये तो आचार्य के अपने संघ में ममत्व के दोष से ध्यान बिगड जाये/असमाधान हो जाये ।
सदासुखदासजी