
रोगादंकादीहिं य सगणे परिदावणादिपत्तेसु ।
गणिणो हवेज्ज दुक्खं असमाधी वा सिणेहो वा॥396॥
दुःख हो सकता आचायाब को यदि होवे शिष्यों को व्याधि ।
अथवा उनके प्रति ममत्व हो तो समाधि की होती हानि॥396॥
अन्वयार्थ : अपना शिष्य यदि रोग/अल्प व्याधि, आतंक/महाव्याधि, इनके द्वारा परिताप को प्राप्त हो जाये तो आचार्य को दु:ख हो जाये, असमाधि हो जाये वा स्नेह हो जाये ।
सदासुखदासजी