तण्हादिएसु सहणिज्जेसु वि सगणम्मि णिब्भओ संतो ।
जाएज्ज व सेएज्ज य अकप्पिदं किं पि वीसत्थो॥397॥
सहन समर्थ पिपासादिक को किन्तु स्व-गण में निर्भय हों ।
भय लज्जादिक त्याग, अयोग्य पदाथाब को माँगे, सेवें॥397॥
अन्वयार्थ : और कदाचित् सहने योग्य भी क्षुधा-तृषादि परीषह आने पर अपने संघ में विश्वासरूप होकर, भय-लज्जारहित होकर अयोग्य वस्तु की याचना करें वा अयोग्य का सेवन करें तो परलोक ही बिगड जायेगा ।

  सदासुखदासजी