
उढ्ढे सअंकवढ्ढिय बाले अज्जाउ तह अणाहाओ ।
पासंतस्स सिणेहो हवेज्ज अच्चंतियविओगे॥398॥
बालयति या वृद्धयति अथवा आर्या को देख अनाथ ।
मरण समय हो चिर-वियोग यह देख स्नेह होता उत्पन्न॥398॥
अन्वयार्थ : वृद्ध मुनीश्वरों को तथा धर्मानुरागरूप जो आपकी गोदी उसमें धर्मरूप से बडेे किये गये, ऐसे बालमुनि तथा और भी संघ का सेवन करनेवाले धर्मानुराग में लीन ऐसी आर्यिका या श्रावक जो अपने आधीन ही धर्मसेवन करते हैं, व्रत पालते हैं, उनको देखकर यदि आचार्य के मरण के अवसर में अत्यंत वियोग होने से स्नेह उत्पन्न हो जाये तो समाधि बिगड जायेगी । इसलिए भी परगणचर्या श्रेष्ठ है ।
सदासुखदासजी