भत्ते वा पाणे वा सुस्सूसाए व सिस्सवग्गम्मि ।
कुव्वंतम्मि पमादं असमाधी होज्ज गणवदिणो॥400॥
खान पान अथवा सेवा में शिष्य वर्ग यदि करे प्रमाद ।
हो असमाधि आचायाब की और ध्यान में होय विघात॥400॥
अन्वयार्थ : अथवा भोजन में, पान में शिष्य जो साधु, श्रावक शुश्रूषा करने में प्रमाद करे तो आचार्य का परिणाम बिगड जाये । मैंने इतने काल तक इनका बहुत उपकार किया । अब हमारे अंत समय में किंचित् टहल, वैयावृत्त्य करने में प्रमादी हो गये, हमारा उपकार भूल गये । ऐसा परिणाम कदाचित् हो जाये तो समाधिमरण बिगड जायेगा और परसंघ में थोडा भी उपकार करें, उसे बहुत मानकर अंगीकार करते हैं । इसलिए अपना संघ छोडकर परसंघ में विहार करना योग्य है ।

  सदासुखदासजी