एदे दोसा गणिणो विसेसदो होंति सगणवासिस्स ।
भिक्खुस्स वि तारिसयस्स होंति पाएण ते दोसा॥401॥
निजगण में समाधि-वांछक आचायाब को होते ये दोष ।
अन्य भिक्षु उपाध्याय प्रवर्तक को भी प्रायः हों ये दोष॥401॥
अन्वयार्थ : इतने जो आज्ञा-कोपादि दोष कहे, वे अपने संघ में रहनेवाले आचार्य को लगते हैं तथा आचार्य समान और भी प्रधान मुनि जो उपाध्याय प्रवर्तक, उन्हें अधिकता से लगते हैं । इसलिए प्रधान मुनि, आचार्य, उपाध्याय, प्रवर्तकादि उन्हें अपना संघ छोडकर परसंघ में विहार करना श्रेष्ठ है ।

  सदासुखदासजी