पं-सदासुखदासजी
एेदे सव्वे दोसा ण होंति परगणाणिवासिणो गणिणो ।
तम्हा सगणं पयहिय बच्चदि सो परगणं समाधीए॥402॥
पर-गण में रहनेवाले आचायाब को नहिं हों ये दोष ।
अतः स्व-गण तज पर-गण जाते ताकि समाधि हो निर्दाेष॥402॥
अन्वयार्थ :
परसंघ में गमन करते हैं ।
सदासुखदासजी