संते सगणे अह्मं रोचेदूणागदो गणमिमोत्ति ।
सव्वादरसत्तीए भत्तीए वढ्ढइ गणो से॥403॥
निज-गण होते हुए हमारे गण में ये रुचि से आए ।
पर-गण भी उनकी सादर शक्ति-भक्ति से सेव करे॥403॥
अन्वयार्थ : अन्य संघ में अपनी रुचि से आयेे हैं - ऐसा विचार करके सर्वसंघ आदरपूर्वक, भरपूर शक्ति से, भक्ति से उनके वैयावृत्त्य में प्रवर्तन करता है ।

  सदासुखदासजी