
गीदत्थो चरणत्थो पच्छेदूणागदस्स खवयस्स ।
सव्वादरेण जुत्तो णिज्जवगो होदि आयरिओ॥404॥
निर्यापक आचार्य क्षपक का ज्ञानी एवं चारित निष्ठ ।
और क्षपक के प्रति होते हैं आदर भाववान परिपूर्ण॥404॥
अन्वयार्थ : गृहीतार्थ अर्थात् सम्यग्ज्ञानी और चारित्र में रहनेवाले ऐसे आचार्य भी परसंघ से आये जो मुनि उनसे प्रार्थना करके बडे आदरपूर्वक संन्यास कराने को निर्यापक होते हैं या बनते हैं ।
सदासुखदासजी