
संविग्गवज्जभीरुस्स पादमूलम्मि तस्स विहरंतो ।
जिणवयणसव्वसारस्स होदि आराधओ तादी॥405॥
उन संसार-भीरु अरु पाप-भीरु निर्यापक चरणों में ।
क्षपक यति सम्पूर्ण जिनागम साररूप आराधक हो॥405॥
अन्वयार्थ : संसार परिभ्रमण से भयभीत हों और पाप से अत्यंत भयवान हों, ऐसे गुरु के चरणों के निकट जाकर, जिनेंद्र के वचनरूप सर्वसार के आराधक होते हैं ।
सदासुखदासजी