+ अब आगे निर्दोष निर्यापकाचार्य को ढूँढने के वर्णनरूप मार्गणा नामक अधिकार सत्तरह गाथाओं द्वारा कहते हैं - -
पंचच्छसत्तजोयणसदाणि तत्तोऽहियाणि वा गंतु ।
णिज्जावगमण्णेसदि समाधिकामो अणुण्णादं॥406॥
योजन पाँच सात सौ से भी अधिक दूर जाकर खोजे ।
आगम सम्मत निर्यापक को वह समाधि वांछक यतिवर॥406॥
अन्वयार्थ : समाधिमरण की इच्छा करनेवाला साधु शास्त्रों में कहे गयेे निर्यापक गुरु को प्राप्त करने के लिये पाँच सौ, छह सौ, सात सौ या इससे भी अधिक योजनपर्यंत खोजते हैं/ तलाश करते हैं ।

  सदासुखदासजी