
एक्कं व दो व तिण्णि य बारसवरिसाणि वा अपरिदंतो ।
जिणवयणमणुण्णादं गवेसदि समाधिकामो दु॥407॥
वर्ष एक दो तीन आदि ले खोजे बारह वर्ष पर्यन्त ।
आगम सम्मत निर्यापक को खेद खिन्न नहिं होता मन॥407॥
अन्वयार्थ : समाधिमरण करने का इच्छुक साधु भगवान के आगम में कहे गये जो निर्यापक के गुण आचारवानादि आगे इसी ग्रन्थ में वर्णन करेंगे । उन गुणों के धारक गुरु को एक वर्ष, दो वर्ष, तीन वर्ष या बारह वर्ष पर्यंत खेदरहित होकर सात सौ योजनपर्यंत ढूँढे, खोजेे, अवलोकन करे ।
सदासुखदासजी