+ आगे निर्यापक गुरु के अवलोकन के लिये अपने संघ का स्वामीपना त्याग कर विहार करना, उसका अनुक्रम कहते हैं - -
गच्छेज्ज एगरादियपडिमा अज्झेणपुच्छणाकुसलो ।
थंडिल्लो संभोेगिय अप्पडिबद्धो य सव्वत्थ॥408॥
अध्ययन पृच्छा1 कुशल क्षपक निशि-प्रतिमापूर्वक2 गमन करे ।
स्थण्डिल3 समभोगी4, भोजन आदिक में अनासक्त विचरे॥408॥
अन्वयार्थ : एक रात्रि प्रतिमायोग धारण करके गमन करें । मूल सूत्र में तो ऐसा अर्थ दिखता है तथा टीकाकार ने दूसरा अर्थ लिखा है ।

  सदासुखदासजी