
आलोयणापरिणदो सम्मं संपच्छिदो गुरुसयासं ।
जदि अंतरा हु अमुहो हवेज्ज आराहओ होज्ज॥409॥
आलोचना करूँगा सम्यक् गुरु समीप - एेसा संकल्प ।
करनेवाला वाक् शक्ति खो दे तो भी वह आराधक॥409॥
अन्वयार्थ : हमारे रत्नत्रय में मन-वचन-काय द्वारा जो दोष अतिचार लगे हैं, वे सभी गुरुजनों को बताऊँगा, विनती करूँगा, ऐसा जिसने संकल्प किया है, उन्हें आलोचनापरिणत कहते हैं । वे आलोचनापरिणत साधु गुरुओं के पास आलोचना करने को प्रयाण करते हैं और यदि मार्ग में ही आपकी जिह्वा बंद हो जाये, थक जाये तो भी आराधक हो ही गये ।
सदासुखदासजी