आलोचणापरिणदो सम्मं संपच्छिदो गुरुसयासं ।
जदि अंतरम्मि कालं करेज्ज आराहओ होइ॥410॥
आलोचना करूँगा सम्यक् गुरु समीप - एेसा संकल्प ।
करके निकला क्षपक मार्ग में मरण करे पर आराधक॥410॥
अन्वयार्थ : अपने अपराध कहने का जिन्होंने चित्त में निश्चय कर लिया है - ऐसे साधु, उन्होंने गुरुओं के निकट जाने के लिये प्रयाण किया है और यदि गुरु के निकट नहीं पहुँच पाये, मार्ग में ही मरण हो जाये तो भी साधु आराधक ही है ।

  सदासुखदासजी