
आलोचणापरिणदो सम्मं संपच्छिदो गुरुसयासं ।
जदि आयरिओ अमुहो हवेज्ज आराहओ होइ॥411॥
आलोचना करूँगा सम्यक् यह विचार कर गुरु के पास ।
जाये क्षपक किन्तु गुरु बोलें नहिं, तो भी वह आराधक॥411॥
अन्वयार्थ : सम्यक् आलोचनारूप परिणत और गुरुओं के निकट जाने को प्रयाण किया है और गुरु/आचार्य उनकी जिह्वा बंद हो जाये तो भी आराधना के लिये आलोचना करने में उद्यमी ऐसे क्षपक साधु की आराधना हो गई ।
सदासुखदासजी