
आलोचणापरिणदो सम्मं संपच्छिदो गुरुसयासं ।
जदि आयरिओ कालं करेज्ज आराहओ होइ॥412॥
आलोचना करूँगा सम्यक् - यह विचारकर गुरु के पास ।
जाये क्षपक किन्तु गुरु पायें मरण, क्षपक है आराधक॥412॥
अन्वयार्थ : सम्यक् आलोचनारूप परिणत तथा गुरुओं के पास जाने को प्रयाण किया और यदि आचार्य काल कर जायें/मरण हो जाये तो भी साधु आराधक ही है ।
सदासुखदासजी