+ कोई कहे कि आलोचना भी नहीं की तथा गुरुओं के द्वारा दिया गया प्रायश्चित्त भी ग्रहण नहीं किया/नहीं कर पाये तो उन्होंनेआराधना को कैसे ग्रहण कर लिया? वह कहते हैं - -
सल्लं उद्धरिदुमणो संवेगुव्वेगतिव्वसढ्ढाओ ।
जं जादि सुद्धिहेदुं सो तेणाराहओ भवदि॥413॥
शल्य हीनता1 चाहे संवेगी उद्वेगी दृढ़-श्रद्धान ।
क्षपक जाए गुरु निकट अतः वह कहा गया है आराधक॥413॥
अन्वयार्थ : जो संवेग, निर्वेद तथा तीव्र श्रद्धान का धारक और शल्य को निकालने का है मन जिनका, ऐसे यति, वे अपने व्रतों के बीच में लगी शल्य, परिणामों की शल्य को दूर करके, अपने आत्मा की शुद्धता के लिये निर्यापक आचार्य के पास जाने के लिए गमन करते हैं । यदि रास्ते में अपनी जिह्वा बंद हो जाये, मरण हो जाये अथवा जिन गुरुओं के निकट जायें, उन गुरुओं का मरण हो जाये, जिह्वा बंद हो जाये तो भी अपने परिणाम तो अपने भावों की शुद्धता करने में ही उद्यमवंत रहे हैं, इसलिए आराधक ही हैं ।

  सदासुखदासजी