
आयारजीदकप्पगुणदीवणा अत्तसोधिणिज्झंझा ।
अज्जवमद्दवलाघवतुट्ठीपह्लादणं च गुणा॥414॥
आचारांग कथित गुण-दीपन1 आत्मशुद्धि संक्लेश विहीन ।
मार्दव आर्जव लाघव तुष्टी आह्लादिक गुण क्षपक महान॥414॥
अन्वयार्थ : परसंघ में जाकर विनयपूर्वक आलोचना करके प्रायश्चित्त ग्रहण करेगा, इसलिए मान कषाय के अभाव से मार्दव गुण प्रगट होता है । शरीर में त्यागबुद्धि करने से लाघव गुण प्रगट होता है । जिसे शरीर में तीव्र ममता है, उसको हलकापन कैसे होगा? शरीरादि में ममत्व, यही बडा भार/ बोझा है, पराधीनता है, इसलिए त्यागबुद्धि से ही लाघव गुण प्रगट होता है ।
और यदि जगत उद्धारक निर्यापक गुरु का संयोग हो जाये तो अपने को कृतार्थ मानते हैं, इससे तुष्टि/आनंद नामक गुण प्रगट होता है तथा अपना और पर का - दोनों का उपकार करके समय व्यतीत होता है, इससे प्रह्लादन/हृदय का सुख भी प्रगट होता है । इतने गुण परसंघ में जाने से प्रगट होते हैं ।
सदासुखदासजी