
आएसं एज्जंतं अब्भुट्ठिंति सहसा हु दठ्ठूणं ।
आणासंगहवच्छल्लदाए चरणे य णादुंजे॥415॥
आगन्तुक यति को लख करके यतिगण शीघ्र खड़े होते ।
आज्ञापालन वत्सलता से और आचरण को जानें॥415॥
अन्वयार्थ : आनेवाले जो अतिथि मुनि, उन्हें देखकर संघ में रहनेवाले मुनि शीघ्र ही उठकर खडे होते हैं । किसलिये खडे होते हैं? जिनेन्द्र की आज्ञा पालने को, रत्नत्रय के धारक का संग्रह करने को, रत्नत्रय के धारकों में वात्सल्य करने को आये जो अतिथि मुनि, उनका चारित्र जानने को अंगीकार करते हैं ।
सदासुखदासजी