+ अब संघ में अंगीकार करके क्या करते हैं? यह कहते हैं - -
आगंतुगवच्छव्वा पडिलेहाहिं तु अण्णमण्णेहिं ।
अण्णोण्णचरणकरणं जाणणहेदुं परिक्खंति॥416॥
क्षपक और संघस्थ साधु गण करें परस्पर प्रतिलेखन1 ।
करें परीक्षा एक-दूसरे के जानें वे चरण-करण॥416॥
अन्वयार्थ : नवीन आये मुनि और संघ में रहनेवाले मुनि परस्पर भूम्यादि को शोधने से परस्पर जानने को चरण अर्थात् समिति और गुप्ति इनकी परीक्षा करते हैं तथा करण/षट् आवश्यक उनकी परीक्षा करते हैं ।

  सदासुखदासजी