+ कहाँ-कहाँ परीक्षा करते हैं? यह कहते हैं - -
आवासयठाणादिसु पडिलेहणवयणगहणणिक्खेवे ।
सज्झाए य विहारे भिक्खग्गहणे परिच्छंति॥417॥
आवश्यक, स्थान, तथा प्रतिलेखन, वचन, ग्रहण, निक्षेप ।
भिक्षाग्रहण विहार अध्ययन आदि परीक्षण करें विशेष॥417॥
अन्वयार्थ : सामायिक, स्तव, वंदना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान, कायोत्सर्ग - इन षट् आवश्यकों के मध्य स्थित रहने में, शरीर, भूमि आदि को नेत्रों से तथा मयूरपिच्छिका से शोधने में परीक्षा करते हैं तथा वचन बोलने में, उपकरण जो शरीर, शास्त्र, पीछी, कमंडलु, इनके ग्रहण करने में या रखने में परस्पर चारित्र की परीक्षा करते हैं । स्वाध्याय करने में, मार्ग में विहार करने में, भोजन ग्रहण करने में, आगन्तुक मुनि की और संघ में रहनेवाले मुनियों की परस्पर परीक्षा करते हैं ।

  सदासुखदासजी