
आएसस्स तिरत्तं णियमा संघाडओ दु दादव्वो ।
सेज्जा संथारो वि य जइ वि असंभोइओ होइ॥418॥
तीन रात्रि तक आगन्तुक की है सहायता करने योग्य ।
अभी परीक्षा नहीं हुई पर संस्तर वसति देने योग्य॥418॥
अन्वयार्थ : जो साथ में आचरण करने योग्य नहीं भी हों तो भी समागत मेहमान मुनि को तीन रात्रिपर्यंत संघ में रहने की आज्ञा देना योग्य है तथा वसतिका-संस्तर देना योग्य है । परीक्षा बिना भी बाह्य शुद्ध मुद्रा देखकर योग्य आचरण के धारक होकर उन्हें संघदान देना ही उचित है ।
सदासुखदासजी