+ यदि परीक्षा किये बिना नवीन आगन्तुक मुनि की संगति रहे तो क्या दोष आते हैं? वह कहते हैं - -
उग्गमउप्पादणएसणासु सोधी ण विज्जदे तस्स ।
अणगारमणालोइय दोसं सभुज्जमाणस्स॥420॥
जिसने आलोचना न की हो एेसे गुरु-संग जो रहता ।
उसकी उद्गम उत्पादन अरु एषण शुद्धि नहीं होती॥420॥
अन्वयार्थ : जो साधु के गुण-दोष जाने बिना उनके साथ (शामिल) आचरण करनेवाले जो आचार्य, वे स्वयं दोष सहित होते हैं अथवा जो मुनि अपने दोषों की आलोचना नहीं करते अथवा शुद्ध नहीं हुए, ऐसे साधु का संग्रह करें, उनके उद्गम, उत्पादन, एषणादि में शुद्धता नहीं होतीहै ।

  सदासुखदासजी