विणएणुवक्कमित्ता उवसंपज्जदि दिवा व रादो वा ।
दीवेदि कारणं पि य विणएण उवठ्ठिए संते॥421॥
दोष लगें हो जो रात्रि में अथवा दिन में लगे हों दोष ।
परिणामों में कर उद्दीपन रहें संघ में विनयसहित॥421॥
अन्वयार्थ : विनयपूर्वक संघ को प्राप्त करके, जो दोष रात्रि में या दिन में लगे हों, उन दोषों के कारणों को परिणामों में उद्दीपन करके प्रगट करके विनयसहित संघ में तिष्ठें/रहें ।

  सदासुखदासजी