
उव्वादो तं दिवसं विस्सामित्ता गणिमुवठ्ठादि ।
उद्धरिदुमणोसल्लं विदिए तदिए व दिवसम्मि॥422॥
गुरु को वन्दन कर आगन्तुक प्रथम दिवस विश्राम करे ।
दूजे तीजे दिवस गुरु के पास जाय मन-शल्य हरे॥422॥
अन्वयार्थ : आगन्तुक साधु मार्गादि से खेदित हुए होने से उस दिन तो संघ में ही विश्राम करते हैं, दूसरे दिन अथवा तीसरे दिन अपनी शल्य निकालने का है मन जिनका, शल्य को उखाडने वाले आचार्य को प्राप्त करते हैं ।
सदासुखदासजी