
अपरिस्साई णिव्वावओ य णिज्जावओ पहिदकित्ती ।
णिज्जवणगुणोवेदो एरिसओ होदि आयरिओ॥424॥
अपरिस्रावी निर्यापक हों और कीर्ति हो जग में व्याप्त ।
निर्यापक गुण भूषित भी हों एेसे होते ह आचार्य॥424॥
अन्वयार्थ : आचारवान, आधारवान, व्यवहारवान, प्रकर्त्ता, आयापायविदर्शी, अवपीडक, अपरिस्रावी, निर्यापक - ये जो निर्यापक के अष्ट गुण हैं । इनके द्वारा निर्यापकपने कीे विख्यात है कीर्ति जिनकी और निर्यापक के गुणों के ज्ञाता ऐसे आचार्य होते हैं, उनकी शरण संन्यास के अवसर में ग्रहण करना ।
सदासुखदासजी