
आयारं पंचविहं चरदि चरावेदि जो णिरदिचारं ।
उवदिसदि य आयारं एसो आयारवं णाम॥425॥
पाँच भेद आचार आचरें आचरवायें निर्-अतिचार ।
उपदेश करें इन आचारों का वे आचारवान आचार्य॥425॥
अन्वयार्थ : जीवादि तत्त्वों की श्रद्धानरूप परिणति, यह दर्शनाचार है । आत्मतत्त्वादि को जाननेरूप प्रवृत्ति, यह ज्ञानाचार है । हिंसादि पंच पापों से निवृत्त होना, यह चारित्राचार है । द्वादश प्रकार के तपों में प्रवृत्ति करना, यह तपाचार है । परीषहादि सहने में अपनी शक्ति को नहीं छिपाना, यह वीर्याचार है । ऐसे पंच प्रकार के आचार, अतिचार रहित स्वयं आचरण करते हैं और अन्य शिष्यों से आचरण कराते हैं, उपदेश देते हैं; वे आचार्य आचारवान हैं ।
सदासुखदासजी