+ अब और भी प्रकार से आचारवानपना कहते हैं- -
दशविहठिदिकप्पे वा हवेज्ज जो सुठ्ठिदो सयायरियो ।
आयारवं खु एसो पवयणामादासु आउत्तो॥426॥
दस प्रकार स्थिति कल्पों में सुस्थित रहते हैं आचार्य ।
पंच समिति त्रयगुप्ति विभूषित हैं आचारवान आचार्य॥426॥
अन्वयार्थ : जो दस प्रकार के स्थितिकल्प आचारांग में कहे, उनमें सदाकाल तिष्ठने वाले/ रहनेवाले आचार्य वे आचारवान होते हैं तथा जो पाँच समिति, तीन गुप्ति ये अष्टप्रवचनमातृका में युक्त रहते हैं, वे आचारवान हैं ।

  सदासुखदासजी