एदेसु दससु णिच्चं समाहिवो णिच्चवज्जभीरू य ।
खवयस्स विसद्धं सो जधुत्तचरियं उवविधेदि॥428॥
दशप्रकार स्थिति कल्पों में सावधान नित रहते हैं ।
पापभीरु आचार्य क्षपक को शुद्धाचरण कराते हैं॥428॥
अन्वयार्थ : जो ये दस प्रकार के स्थितिकल्प कहे, इनमें नित्य ही सावधान और पाप से भयभीत ऐसे आचार्य, जो सल्लेखना करने को आये क्षपक, उन्हें शास्त्रोक्त शुद्धचर्या ही कराते हैं ।

  सदासुखदासजी