
चोद्दसदसणवपुव्वी महामदी सायरोव्व गंभीरो ।
कप्पववहारधारी होदि हु आधारवं णाम॥434॥
नव-दस-चौदह पूर्वी महामती सागर-सम हो गम्भीर ।
प्रायश्चित्त शास्त्र का ज्ञाता हो आधारवान आचार्य॥434॥
अन्वयार्थ : जो चौदह पूर्व के धारी, दस पूर्व के धारी, नव पूर्व के धारी हों और महाबुद्धिमान हों, समुद्र के समान गंभीर हों, कल्पव्यवहार के जाननेवाले हों, वे आचार्य आधारवान गुण के धारक होते हैं ।
सदासुखदासजी