
णासेज्ज अगीदत्थो चउरंगं तस्स लोगसारंगं ।
णट्ठम्मि य चउरंगे ण उ सुलहं होइ चउरंगं॥435॥
सूत्रार्थ नहिं ज्ञात जिसे चतुरंग1 क्षपक के नष्ट करे ।
दर्श-ज्ञान-चारित तप होंय विनष्ट पुनः दुर्लभ होते॥435॥
अन्वयार्थ : जो अगृहीतार्थ/जिनसूत्र के ज्ञानरहित गुरु के निकट बसे तो साधु का दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप - यही है चतुरंग, उसका नाश कर देता है । कैसा है चतुरंग? लोक में सारभूत अंग हैं और चतुरंग का विनाश हो जाये तो फिर चतुरंग का पाना सुलभ नहीं है ।
सदासुखदासजी