+ कोई यह कहे कि अगृहीतार्थ जो ज्ञानरहित गुरु, वह क्षपक के सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और सम्यक् तप का नाश कैसे करते हैं? वह कहते हैं - -
संसारसावरम्मि य अणंतबहुतिव्वदुक्खसलिलम्मि ।
संसरमाणो दुक्खेण लहदि जीवो मणुस्सत्तं॥436॥
संसारसावरम्मि य अणंतबहुेतव्वदुक्खसेललम्मि ।
संसरमाणाि दुक्खणि लहेद जीवाि मणुस्सत्तं॥436॥

  सदासुखदासजी