एवमवि दुल्लहपरंपरेण लद्धू ण संजमं खवओ ।
ण लहिज्ज सुदी संवेगकरी अबहुस्सुयसयासं॥438॥
परम्परा से एेसे दुर्लभ संयम-भूषित-मुनिवर को ।
निर्यापक अल्पज्ञ निकट संवेगकरी उपदेश अलभ॥438॥
अन्वयार्थ : अनंत और बहुत तीव्र दु:खरूप जल से भरा संसाररूप समुद्र, उसमें अनंतानंत काल से परिभ्रमण करते हुए इस जीव ने बहुत दु:ख से/मुश्किल से मनुष्य जन्म पाया है और मनुष्य जन्म भी पा लिया तो जैसे मनुष्य जन्म दुर्लभ है, वैसे ही उत्तम देश पाना दुर्लभ है और उत्तम देश भी पा लिया तो उत्तम कुल, उत्तम जाति पाना बहुत दुर्लभ है और उत्तम कुल- जाति भी पा ली तो सुन्दर रूप, रोग रहित शरीर, दीर्घ आयु, निर्मल बुद्धि पाना दुर्लभ है । कदाचित् तीक्ष्ण बुद्धि भी पा ली तो सर्वज्ञ वीतराग के द्वारा कहे धर्म का सुनना दुर्लभ और कदाचित् धर्म श्रवण भी कर लिया तो ग्रहण करना तथा श्रद्धान होना अतिदुर्लभ है और श्रद्धान भी हो जाये तो संयम धारण करना अत्यंत ही दुर्लभ है । ऐसी दुर्लभता की परंपरा से पाया जो संयम, उसे अल्पज्ञानी के पास बसनेवाला क्षपक/मुनि, वह धर्मानुराग करनेवाले उपदेश को प्राप्त नहीं होता ।

  सदासुखदासजी