
सम्मं सुदिमलहंतो दीहद्धं मुत्तिमुवगमित्ता वि ।
परिवडइ मरणकाले अकदाधारस्स पासम्मि॥439॥
सम्यक् श्रुति से वंचित मुनिवर दीर्घ काल शिवपंथ चलें ।
निराधार1 आचार्य निकट वे मरण समय संयम च्युत हों॥439॥
अन्वयार्थ : जिनसूत्र के आधार रहित अज्ञानी आचार्य के पास रहनेवाले जो साधु सत्यार्थ श्रुत के उपदेश को प्राप्त नहीं होते, उन्हें मुक्ति के मार्ग से अति दूर जानना, कठिन जानना, वे मरण समय में रत्नत्रय से पतित हो जाते हैं/रत्नत्रय को छोड देते हैं ।
सदासुखदासजी