
गीदत्थो पुण खवयस्स कुणदि विधिणा समाधिकरणाणि ।
कण्णाहुदीहिं उवढोइदो य पज्जलइ ज्झाणग्गी॥447॥
गृहीतार्थ1 आचार्य क्षपक का विधि से समाधान करते ।
कानों में उपदेश आहुति दे ध्यानाग्नि भड़काते॥447॥
अन्वयार्थ : जो गुरु गृहीतार्थ हो तो संस्तर करने में उद्यमी और क्षुधा-तृषा से पीडित ऐसे क्षपक की विधिपूर्वक समाधान क्रिया करते हैं । "जैसे क्षपक की वेदना का उपशम हो, परम शांतता को प्राप्त हो जाये, ऐसा यत्न करते हैं । जैसे घृतादि की आहुति से अग्नि प्रज्वलित होती है, तैसे ही कर्ण में धर्मोपदेशरूप आहुति ऐसी देते हैं, जिससे ध्यानरूपी अग्नि प्रज्वलित हो जाये ।
सदासुखदासजी