
खवयस्सिच्छासंपादणोण देहपडिकम्मकरणेण ।
अण्णेहिं वा उवाएहिं सो समाहिं कुणइ तस्स॥448॥
इच्छा पूर्ति करे क्षपक की तन-बाधा प्रतिकार करे ।
अन्य उपायों से भी उनकी गृहीतार्थ सुसमाधि करे॥448॥
अन्वयार्थ : गृहीतार्थ आचार्य वेदना से दु:खित जो क्षपक, उनकी इच्छा अनुसार करके तथा देह की बाधा जैसे मिट जाये वैसे हाथ, पैर, मस्तक इत्यादि दबाना, स्पर्शन करना इत्यादि के द्वारा मिष्ट वचन, उपकरण दान, प्रासुक संयोगादि करके तथा पूर्व में जो अनेक साधु घोर उपसर्ग-परीषह सहकर आत्मकल्याण को प्राप्त हुए, उनकी कथा सुनाकर, देह से भिन्न आत्मा का अनुभव कराके, क्षपक के परिणाम को वेदना से भिन्न करके रत्नत्रय में सावधान करते हैं ।
सदासुखदासजी