
णिज्जूढं पि य पासिय मा भीही देइ होइ आसासो ।
संधेइ समाधिं पि य वारेइ असंवुडगिरं च॥449॥
निर्यापक से त्यक्त देख मत डरो कहें आश्वासन दें ।
इन सम कौन समाधिकाल में देह और आहार तजें॥449॥
अन्वयार्थ : अन्य वैयावृत्त्य करनेवालों से रहित देखकर निर्यापक गुरु कहते हैं - भो साधो! तुम ऐसा भय मत करो कि मुझे परीषहों से चलायमान देखकर सर्व संघ के मुनियों ने मेरा त्याग किया है । हम सर्व प्रकार से तुम्हारी सेवा करने में उद्यमी हैं, हम तुम्हें नहीं छोडेंगे, ऐसा अभयदान देते हैं और बारम्बार धैर्य देकर आश्वासन देते हैं । भो मुने! इस संसार में परिभ्रमण करते हुए प्राणी ने कौन-से दु:ख नहीं भोगे? और नहीं भोगेगा? इसलिए अब धैर्य धारण करने का अवसर है । कर्म फल देकर शीघ्र निर्जरा को प्राप्त होंगे, आकुलता करके कर्मबंधन को दृढ मत करना । ऐसा बारम्बार मिष्ट उपदेश देकर रत्नत्रय में जोड देते हैं तथा क्षपक को वेदना से आकुलित देख किसी अज्ञानी ने असंवररूप वचन कहे हों तो उनका निवारण करते हैं कि तुम्हें ऐसी अवज्ञा नहीं करनी चाहिए । वे धन्य हैं, महान हैं, जो सर्व आहारादि त्याग कर आराधना में परम उत्साह से वर्तते हैं ।
सदासुखदासजी