जाणदि फासुयदव्वं उवकप्पेदुं तहा उदिण्णाणं ।
जाणइ पडिकारं वादपित्तसिंभाण गीदत्थो॥450॥
भूख प्यास उपशामक द्रव्यों को देना जानें आचार्य ।
बात पित्त कफ का प्रकोप होने पर करते हैं प्रतिकार॥450॥
अन्वयार्थ : और गृहीतार्थ गुरु कैसे हैं? उत्कृष्टता को प्राप्त हुई है क्षुधा-तृषादि की वेदना, उसका नाश करने में समर्थ ऐसे प्रासुक द्रव्यों केे संयोग को जानते हैं, जिससे वेदना मिट जाये और संयम-त्याग नहीं बिगडे तथा जिन इलाजों से वात, पित्त, कफ जनित वेदना नष्ट हो जाये, ऐसे मुनि के योग्य द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव को ज्ञानवान गुरु ही जानते हैं ।

  सदासुखदासजी