
अहव सुदिपाणयं से तहेव अणुससिठ्ठिभोयणं देइ ।
तण्हाछुहाकिलिंतो वि होदि ज्झाणे अविक्खित्तो॥451॥
श्रुति-पानक1 अनुशासन-भोजन देते हैं मुनि को आचार्य ।
भूख प्यास से पीड़ित मुनि भी इससे करें चित्त एकाग्र॥451॥
अन्वयार्थ : अथवा श्रुतिरूप तो पान और शिक्षारूप ऐसा भोजन देते हैं कि जिससे क्षुधातृ षा से पीडित साधु भी ध्यान में विक्षेपरहित, क्लेशरहित हो जाते हैं ।
सदासुखदासजी