
गीदत्थपादमूले होंति गुणा एवमादिया बहुगा ।
ण य होइ संकिलेसो ण चावि उप्पज्जदि विवत्ती॥452॥
इस प्रकार बहु-गुण होते हैं पाद-मूल में बहुश्रुत के ।
संक्लेश उत्पन्न न हो नहिं होती कोई विपत्ति भी॥452॥
अन्वयार्थ : बहुश्रुति के चरणों के निकट, पूर्व में पाँच गाथाओं द्वारा कहे जो बहुत प्रकार के गुण और भी अनेक गुण प्रगट होते हैं । संक्लेश परिणाम नहीं होते, रत्नत्रय में विपत्ति भी नहीं आती, इसलिए श्रुतज्ञान के आधारवान गुरु की ही शरण ग्रहण करना श्रेष्ठ है ।
ऐसे सुस्थित अधिकार में आचार्य का आधारवान नामक दूसरा गुण उन्नीस गाथाओं द्वारा कहा ।
सदासुखदासजी