
पंचविहं ववहारं जो जाणइ तच्चदो सवित्थारं ।
बहुसो य दिट्ठकयपठ्ठवणो ववहारवं होइ॥453॥
जो विस्तार पूर्वक जाने पंच भेद व्यवहार स्वरूप ।
प्रस्थापन कृत दृष्ट1 बहुत जन को है वह व्यवहार सहित2॥453॥
अन्वयार्थ : पंच प्रकार का व्यवहार/प्रायश्चित्त उसे तत्त्व से जाने, विस्तार सहित जाने और बहुत बार आचार्य के निकट प्रायश्चित्त देते देखा हो तथा स्वयं ने प्रायश्चित्त दिया हो, वे व्यवहारवान होते हैं ।
सदासुखदासजी