
आगमसुद आणाधारणा य जीदेहिं हुंति ववहारा ।
एदेसिं सवित्थारा परूवणा सुत्तणिद्दिट्ठा॥454॥
आगम श्रुत-आज्ञा धारण अरु जीत पंच व्यवहार प्रकार ।
अन्य ग्रन्थ में कहा गया है इन सबका स्वरूप विस्तार॥454॥
अन्वयार्थ : 1. आगम, 2. श्रुत, 3. आज्ञा, 4. धारणा, 5. जित - ये पंच प्रकार के व्यवहारसूत्र/प्रायश्चित्तसूत्र हैं । इनकी विस्तारसहित प्ररूपणा पुरातन सूत्रों में की गई है । सर्व जनों के अग्रभाग में/सामने प्रायश्चित्त कहने योग्य नहीं है । प्रायश्चित्त ग्रन्थ जो आचार्य होने योग्य हों, उन्हीं को पढाते हैं, अन्य को पढने की योग्यता नहीं है । इसलिए प्रायश्चित्त के ग्रन्थ भिन्न ही हैं ।
सदासुखदासजी