पं-सदासुखदासजी
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कोई कहेगा कि जो व्यवहारवान आचार्य, वे अन्य मुनीश्वरों के द्वारा की गई आलोचना/अपराध, उसका प्रायश्चित्त कैसे देते हैं? इसलिए प्रायश्चित्त देने का अनुक्रम कहते हैं -
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दव्वं खेत्तं कालं भावं करणपरिणाममुच्छाहं ।
संघदणं परियायं आगमपुरिसं च विण्णाय॥455॥
द्रव्य क्षेत्र अरु काल भाव परिणाम करण उत्साह प्रबल ।
प्रायश्चित काल-प्रवज्या आगम अरु पौरुष को जान॥455॥
सदासुखदासजी