मोत्तूण रागदोसे ववहारं पठ्ठवेइ सो तस्स ।
ववहारकरणकुसलो जिणवयणविसारदो धीरो॥456॥
प्रायश्चित में कुशल जिनागम निपुण, धीर जो हैं आचार्य ।
राग-द्वेष से रहित हुए हैं देते हैं प्रायश्चित सार॥456॥
अन्वयार्थ : जो प्रायश्चित्त देने में प्रवीण हो, जिनागम का ज्ञाता हो, महाधीर हो, बुद्धिमान हो, ऐसे प्रायश्चित्त देनेवाले आचार्य वे द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, क्रिया, परिणाम, उत्साह, संहनन, पर्याय जो दीक्षा का काल, आगम/शास्त्रज्ञान और पुरुष - इनका स्वरूप अच्छी तरह जानकर, राग-द्वेष को छोडकर और जो क्षपक/मुनि, उन्हें प्रायश्चित्त में स्थापन करते हैं(प्रायश्चित्त देते हैं ।)

  सदासुखदासजी