
ववहारमयाणंतो ववहरणिज्जं च ववहरंतो खु ।
उस्सीयदि भवपंके अयसं कम्मं च आदियदि॥457॥
प्रायश्चित से हैं अजान पर जो प्रायश्चित करे प्रदान ।
वह डूबे भव-कीच मध्य अपयश अरु करें कर्म-बन्धन॥457॥
अन्वयार्थ : जिसने गुरुओं के पास प्रायश्चित्त सूत्र शब्द और अर्थ से तो पढा नहीं और दूसरों का अतिचार दूर करने के लिये प्रायश्चित्त देते हैं, वे संसाररूप कर्दम में डूबते हैं और अपयश को प्राप्त होते हैंं तथा प्रायश्चित्त सूत्र को जाने बिना वृथा आचार्यपने का गर्व करके प्रायश्चित्त देते हैं, वे उन्मार्ग का उपदेश देकर, सम्यग्दर्शन का नाश करके मिथ्यादृष्टि होकर तीव्र कर्म के बंधन को प्राप्त होते हैं ।
सदासुखदासजी