
जह ण करेदि तिगिंच्छं वाधिस्सतिगिंच्छ
ववहारमयाणंतो ण सोधिकामो बिसुज्झेइ॥458॥
जैसे अकुशल वैद्य व्याधि की करे चिकित्सा नहीं कभी ।
त्यों व्यवहार अजान शुद्धिकामी1 को शुद्ध करे न कभी॥458॥
अन्वयार्थ : जैसे मूर्ख वैद्य है, वह किसी रोग से पीडित पुरुष का इलाज करने में समर्थ नहीं होता, वैसे ही प्रायश्चित्त सूत्र को नहीं जाननेवाला और वृथा ही आचार्यपने के गर्व से अतिचारादि की शुद्धता करने के इच्छुक क्षपक को कदापि शुद्ध नहीं कर सकता ।
सदासुखदासजी