तम्हा णिव्विसिदव्वं ववहारवदो हु पादमूलम्मि ।
तत्थ हु विज्जा चरणं समाधिसोधी य णियमेण॥459॥
अतः क्षपक प्रायश्चित-ज्ञाता गुरु-चरणों में करे निवास ।
इससे ज्ञान चरित्र समाधि और शुद्धि निश्चय से जान॥459॥
अन्वयार्थ : इसलिए प्रायश्चित्त के ज्ञाता जो आचार्य, उनके चरणों के निकट तिष्ठना/रहना योग्य है; क्योंकि उनके निकट ज्ञान, समाधिमरण तथा आत्मा की विशुद्धि नियम से होती है ।
ऐसे सुस्थित अधिकार में निर्यापकाचार्य का व्यवहारवान नामक तीसरा गुण सात गाथाओं द्वारा कहा ।

  सदासुखदासजी